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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

बोनसाई- एक शौक जीवनभर के लिये...

  बोनसाई, जब मैंने पहली बार करीब 30 वर्ष पहले टेलीविजन पर एक कार्यक्रम में देखा, तभी उस पर मोहित हो गया। उसके बारे में और ज्यादा जानने की जिज्ञासा हुई। तत्पश्चात मेरे द्वारा बरगद, पीपल आदि के पौधों से बोनसाई बनाने की शुरुआत हुई।जोकि कुछ वर्ष धीमी होने के बाद आज अनवरत जारी है।
   आज का बढ़ता हुआ शहरीकरण एवं बहुमंजिला इमारतों में रहने की व्यवस्था व संस्कृति के कारण हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। कई बार हमको पेड़ पौधों का शौक होने के बावजूद पर्याप्त कच्चा स्थान नहीं मिल पाता है, अपनी पसंद के पेड़ पौधे उगाने हेतु। 
        उस स्थिति में बोनसाई बनाने का शौक हमें एक आशा की किरण नजर आता है। इसके अंतर्गत हम गमलों एवं बोनसाई पात्रों में ही वृक्षों को लघु रूप में उगाते हैं। ये आकार प्रकार में छोटे किन्तु गुणों व सुंदरता में बड़े वृक्षों जैसे ही दिखते हैं।अर्थात इनको उसी आकार प्रकार में ढाल कर सूक्ष्म रूप में सुशोभित किया जाता है।
     बोनसाई जापानी भाषा के बोन
 ( उथला पात्र या बरतन) एवं साई
 ( वृक्ष) से मिलकर बना है। हिंदी भाषा में बोनसाई को वामन वृक्ष कहा जाता है, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में 'बोनसाई ' शब्द ही प्रचलित है ।
बोनसाई बनाने हेतु मुख्य तकनीकी बिंदु ( Technique for Growing Bonsai trees ) :- 
* पौधे का चयन ( Selection of a bonsai plant ) - बोनसाई बनाते समय सर्वप्रथम यह ध्यान में रखना चाहिए कि जो भी पौधे आप चयन कर रहे हैं वह हमारी जलवायु के अनुरूप हैं या नहीं । यह छोटे बोनसाई पात्रों ( bonsai pots) में जीवित रह पाने में सक्षम होंगे या नहीं । इसके अलावा आपके द्वारा चयनित पौधा बोनसाई बनाने के दौरान की जाने वाली प्रक्रियाओं जैसे शाखाओं व अतिरिक्त जड़ों की कटिंग ( pruning), तार बंधन (wiring) आदि की ट्रेनिंग द्वारा मनचाहा रूप ले सकेगा या नहीं । ये सभी बातें तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं जब आप बोन्साई बनाने के क्षेत्र में बिलकुल नये हों ।
        बोनसाई हेतु पौधों को बीजों, कटिंग, गूटी (air layering) आदि से तैयार किया जा सकता है। बीजों से बोनसाई तैयार करने में बहुत समय लगता है जबकि कटिंग, गूटी और ग्राफ्टिंग से बोनसाई जल्दी तैयार हो जाते हैं। इसके अलावा आप नर्सरी से भी पौधे खरीद सकते हैं, और जंगल से स्वयं भी संग्रह करके ला सकते हैं।
       अधिकांश नये लोग शुरू में ही पौधे को बोनसाई पात्र (bonsai pot) में तैयार करने लगते हैं जिससे पौधे की बहुत धीमी वृद्धि होने के कारण बोनसाई को एक सुंदर रूप में पहुंचने में अधिक समय (वर्ष) लगता है। इसके लिए पौधे को पहले किसी बड़े गमले (ट्रेनिंग पॉट) में लगाकर, उससे अच्छी वृद्धि प्राप्त कर ली जाती है तत्पश्चात कुछ वर्ष(3 से 4 वर्ष) बाद पौधे को उथले (shallow) बोनसाई पात्र में स्थानांतरित (repot) कर दिया जाता है। 
     हमारे देश में बोनसाई हेतु अधिकांश पौधे उष्ण जलवायु (tropical climate) व शीतोष्ण जलवायु ( temperate) के चयन किये जाते हैं जैसे - बरगद , पीपल , पिलखन, जामुन, नीम, नींबू, अनार, चिर पाइन , जुनिपर आदि। स्थानीय प्रजाति के वृक्ष होने के कारण उनके स्वस्थ रूप से वृद्धि के अवसर अधिक हो जाते हैं। 
* बोनसाई पात्र प्रयोग एवं  बोनसाई को पुनः नए बोनसाई पात्र में लगाना ( Potting of bonsai and Repotting of a bonsai ) :- 2 से 5 वर्ष ट्रेनिंग पॉट में बिताने के बाद जब बोनसाई अपने सुंदर रुप को ग्रहण करने लगता है तब उसको बोनसाई पात्र में रिपोट कर दिया जाता है जिसकी गहराई सामान्य गमलों से कम ही होती है। 
   बोनसाई पात्र सिरेमिक, टेराकोटा (मिट्टी) , व प्लास्टिक आदि के बने हो सकते हैं। सिरेमिक के अनग्लेज पात्रों (unglezed pots) को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि इनमें रन्ध्र (pores) पाये जाते हैं । बोनसाई पॉट्स में पानी निकासी का छिद्र (drainge hole) बड़े आकार का या एक से ज्यादा छिद्र हों तो बोनसाई की स्वास्थ्य हेतु बेहतर रहता है। 
      पौधा लगाते समय जल निकासी छिद्रों को terakota pot या मिट्टी के घड़े के छोटे छोटे टुकड़ों या कंकडों से ढक देना चाहिए। उसके बाद नदी की रेत (river sand) व पत्तियों की खाद(leaf mould) एवं सामान्य मिट्टी (Garden soil) से बने मिश्रण (soil mix) में पौधे को लगाना चाहिए। यदि हम सामान्य मिट्टी ही प्रयोग करते हैं तो वह धीरे धीरे बहुत ठोस हो जाती है जिससे अतिरिक्त पानी, निकासी छिद्रों से नहीं निकल पाता और बोनसाई की रेशेदार जडों का जाल भी नहीं बन पाता।
       बोनसाई पॉट में पौधा बिलकुल बीच में या थोड़ा हटकर लगाया जाता है, जिससे वह ज्यादा प्राकृतिक लगता है। बोनसाई क्योंकि कम मिट्टी में लगाये जाते हैं इसलिए मिट्टी से पौधे हेतु आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है इसीलिए बोनसाई की समय समय पर रिपोटिंग की जाती है।जिसके अंतर्गत बोनसाई के आकार के अनुपात में नया पात्र(पॉट) लिया जाता है और पुरानी मिट्टी को बदलकर नये बोनसाई मिट्टी मिश्रण(bonsai soil mix) में बोनसाई को लगाया (repot) जाता है।बड़े आकार वाले बोनसाई को प्रतिवर्ष और छोटे आकार वाले व शोहीन बोनसाई पेडों को 2 से 3 वर्ष बाद रीपोटिंग की आवश्यकता होती है।
      रीपोटिंग के समय जब पुरानी मिट्टी को हटा रहे होते हैं तभी अनावश्यक tap root को और मृत काली पड़ गयी जडों को हटा देते हैं और रेशेदार व पतली जडों को छोड़ दिया जाता है। यदि ये जड़ें बोनसाई पॉट से बाहर निकल रही हों तो इनको भी आकार अनुरूप थोड़ा सा ट्रिम कर लिया जाता है।
     इस प्रकार हम देखते हैं कि चारों तरफ फैली हुई रेशेदार जड़ें जोकि संख्या में भी अधिक होती हैं वही एक स्वस्थ और मजबूत बोनसाई के लिए आवश्यक होती हैं।
     इस प्रकार एक उचित आकार प्रकार वाला बोन्साई पॉट और उसमें लगा बोनसाई ट्री मिलकर एक सुंदर व मनमोहक बोनसाई का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
* शाखाओं की काट छांट (Pruning and Pinching of a bonsai) :-
      बोनसाई की शाखाओं व पत्तियों की काट छाँट या प्रूनिंग बोनसाई को उचित व सुंदर आकार में रखने के लिए और उसे घना रखने हेतु अति आवश्यक होती है।इसके अलावा प्रूनिंग द्वारा हम बड़ी पत्तियों वाले बोनसाई पर आकार में थोड़ी छोटी पत्तियां भी प्राप्त कर सकते हैं।प्रूनिंग से एक फायदा यह भी होता है कि सूर्य का प्रकाश अंदर की शाखाओं तक भी पहुँचने लगता है जिससे बोनसाई को मज़बूती और ताकत मिलती है।
     इसके अलावा ऊपर की ओर अनावश्यक वृद्धि रोकने हेतु जब हम प्रूनिंग करते हैं तो नीचे की दाएं या बाएं ओर की शाखाओं को मजबूती और वृद्धि मिलती है और बोनसाई एक संतुलित एवं सुन्दर आकार प्राप्त कर लेता है।
* पानी और खाद देना( Watering and Manuring):-
      बोनसाई को मौसम के अनुसार पानी दिया जाता है, गर्मियों में पानी प्रतिदिन आवश्यक होता है, पर कभी-कभी सुबह- शाम दोनों समय यदि बोनसाई बहुत छोटे पोट्स में लगे हों तो। सर्दियों में 2 - 3 दिन छोड़कर पानी दिया जाता है या आवश्यकता होने पर। वर्षा ऋतु में ज्यादा आवश्यकता नहीं होती लेकिन जब  बारिश होने के दिनों में अंतराल हो जाता है तब  बीच में पानी अवश्य दिया जाता है।इसके अलावा मिट्टी को देखकर यह लग रहा है कि बोनसाई को पानी की आवश्यकता है तब तुरंत पानी देना चाहिए। 
      फाइकस (Ficus) परिवार के बोनसाई जैसे बरगद, पीपल और पिलखन आदि को ऊपर से पानी की बौछार की भी आवश्यकता होती है जिससे उनको हवा में पर्याप्त नमी भी मिल सके। यह नमी इनमें हवाई जड़ें (aerial roots) उत्पन्न करने के लिए आवश्यक होती है। और हाँ , कभी भी आवश्यकता से अधिक पानी(over watering) नहीं दे, जिससे पौधे की जडों में सड़न या गलन( root rotting) न हो ।
      जैसा कि हम जानते हैं कि बोनसाई के पॉट में मिट्टी की मात्रा सीमित होती है अतः समय के साथ आवश्यक पोषक तत्त्वों(essential nutrients) की कमी हो जाती है। इसलिए पौधे के वृद्धि काल में समय समय पर देशी खाद की मात्रा भी मिलानी चाहिए। फरवरी - मार्च से लेकर मानसून मौसम तक प्रत्येक महीने के अंतराल पर गोबर व पत्ती की देशी खाद बोनसाई को दी जानी चाहिए। 
      इसके अलावा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अलग अलग प्रजाति के बोनसाई वृक्षों को खाद की आवश्यकता अलग अलग मात्रा में और अलग अलग अंतराल पर होती है। 
      रासायनिक खादों का प्रयोग बहुत ही सावधानीपूर्वक करना चाहिए क्योंकि इनकी अतिरिक्त मात्रा आपके बोनसाई हेतु हानिकारक भी हो सकती है। 
बोनसाई की विभिन्न शैलियाँ या पद्यतियाँ ( Different Styles of Bonsai) :- 
      हमारी प्रकृति में वृक्ष जिन विभिन्न आकार प्रकारों में पाये जाते हैं उन्हीं आकार प्रकारों को अपने बोनसाई वृक्षों में ढालना और उनका सूक्ष्म प्रतिरूप या नमूना बनाना बोनसाई प्रेमियों का लक्ष्य होता है। 
* बोनसाई का आकार के अनुसार वर्गीकरण ( Classification of bonsai according to size) :- 
    शोहीन या मामे बोनसाई - 15 सेमी से कम।
    छोटा बोनसाई - 15 सेमी से 30 सेमी तक।
    मध्यम आकार बोनसाई - 30 सेमी से 60 सेमी तक।
    बड़े आकार वाले बोनसाई - 60 सेमी से ऊपर ।
     मोटे तौर पर बड़ी पत्तियों वाले एवं फल देने वाले पेडों के बोनसाई का आकार बड़ा रखा जाता है वहीं छोटी पत्तियों वाले और झाड़ीनुमा पौधों वाले बोनसाई को आकार में छोटा रखा जाता है। यह सभी आप अपने अनुभव से भी धीरे धीरे सीख सकते हैं।
तने के आकार के अनुसार बोनसाई शैलियाँ :-
(1) सीधा तना शैली ( Formal upright style) :- 
     इसमें बोनसाई का तना सीधा रहता है जो क्रमशः ऊपर की ओर पतला होता चला जाता है। बाकी शाखाएँ पिरामिड या छतरी का आकार ( pyramid or umbrella shape) बनाती हैं। तना आधार में मोटा एवं आधारीय जड़ें सभी दिशाओं में फैली रहती हैं जो बोनसाई को एक संतुलित एवं सुंदर रूप प्रदान करती हैं। बकाईन वृक्ष

(2) अनियमित सीधा तना शैली(Informal upright style) :- 
     इस शैली के बोनसाई के तने में संतुलित एवं सुंदर घुमाव होते हैं जो कि आधार की तरफ ज्यादा और ऊपरी सिरे की ओर कम होते जाते हैं।इसके अलावा बोनसाई का ऊपरी सिरा(apex) ठीक आधार के ऊपर ही होता है।अधिकांश पतझड़ वाले वृक्ष इस शैली हेतु उपयुक्त माने जाते हैं।jade plant

(3) तिरछा तना शैली (Slanting style):-
     इस शैली में बोनसाई का तना दायीं या बायीं ओर लगभग 45 अंश के angle पर झुका होता है। आधार पर जड़ें झुकाव की विपरीत दिशा में ज्यादा दिखाई देती हैं जोकि बोनसाई ट्री को एक संतुलित रूप प्रदान करती हैं।पहली शाखा तने के झुकाव के विपरीत दिशा में रखी जाती है।बरगद Banyan tree(Ficus benghalensis )

(4) प्रपाती या झरनेनुमा शैली (Cascade style):- 
     इसके अंतर्गत बोनसाई का तना एक ओर झुकते हुए पॉट के आधार से भी नीचे तक चला जाता है। इनको लंबे एवं गहरे पॉट में लगाया जाता है ताकि झुके हुए तने को पर्याप्त जगह मिल जाये, ऐसे पॉट को भी किसी ऊंची टेबल पर रख कर प्रदर्शित किया जाता है।Ficus benjamina

(5) अर्ध प्रपाती शैली (Semi cascade style) :- 
     इस पद्यति या शैली में बोनसाई का तना पॉट के एक ओर झुका तो होता है लेकिन पॉट के आधार से ऊपर ही रहता है। Ficus microcarpa long island

(6) हवा के थपेड़े खाने वाली शैली ( Windswept style) :-
     इस प्रकार के वृक्ष प्रकृति में समुद्री कगार(sea cliff) पर, पर्वतों पर पाये जाते हैं जहाँ तेज हवायें लगातार एक ही दिशा में चलती रहती हैं। जिस कारण इन वृक्षों की शाखाएं एक ही दिशा में हो जाती हैं। यही प्रतिरूप windswept शैली बोनसाई को दिया जाता है।Adenium or Desert rose

(7) लिटराटी शैली ( Literati style) :- 
     इस प्रकार के बोनसाई का तना अनियमित आकार का ऊपर तक चला जाता है जिसके  ऊपरी सिरे पर ही कुछ शाखायें एवं घनी पत्तियाँ होती हैं। Ficus amplissima 
बोनसाई के तनों की संख्या के आधार पर वर्गीकरण (Classification according to the numbers of trunks) -
(1) एक तना शैली ( Single trunk) :- 
     बोनसाई ट्री का केवल एक ही तना होता है जोकि अधिकांशतः सीधा तना या अनियमित तना प्रकार की शैली में मिलता है।पिलखान ( Ficus virens )

(2) जुड़वाँ तना शैली( Twin trunk style) :- 
     इसमें दो तने होते हैं जिनका आधार एक ही होता है, जहां एक तना दूसरे से थोड़ा छोटा रहता है और बड़ा तना थोड़ा मोटा भी रखा जाता है। 
(3) बहुतना शैली ( Multi trunk style) :- 
     इस तरह के बोनसाई में तनों की संख्या दो से ज्यादा होती है जैसे 3 या 5 तक । तनों की लंबाई अलग अलग होनी चाहिए। 
(4) समूह या जंगल पद्यति ( Group or Forest style) :-
     इस शैली के बोनसाई में 5 से अधिक की कोई विषम संख्या (Odd numbers) जैसे 7, 9, 11,13, 15, 17 की संख्या में एक बड़ी व अण्डाकार बोनसाई प्लेट में बोनसाई जंगल का नमूना तैयार किया जाता है।दोनों किनारों पर छोटे आकार के वृक्ष और बीच में लम्बे वृक्षों का चयन किया जाता है। अधिकांशतः वृक्ष एक ही प्रजाति के हों यह ध्यान रखा जाता है। बड़े वृक्षों के बीच में एक रास्ता या मार्ग रखा जाता है जो कि जंगल की गहराई का अहसास कराता है।